पाठ्यक्रम: जीएस-3/ऊर्जा
सन्दर्भ
- विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गूगल AI डेटा सेंटर ने एग्रीवोल्टाइक (Agrivoltaics) की अवधारणा को AI अवसंरचना की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए एक सतत समाधान के रूप में चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पृष्ठभूमि
- गूगल ने आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 1 गीगावाट (GW) क्षमता वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) डेटा सेंटर की स्थापना के लिए 15 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की घोषणा की है।
- एआई डेटा सेंटरों को सर्वर, शीतलन (Cooling) प्रणालियों तथा डिजिटल अवसंरचना के संचालन के लिए अत्यधिक मात्रा में विद्युत की आवश्यकता होती है।
- यदि यह मांग वर्तमान विद्युत ग्रिड से पूरी की जाती है, तो इससे विद्युत आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, कृषि एवं घरेलू उपयोग के लिए बिजली की उपलब्धता कम हो सकती है तथा जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता बढ़ सकती है।
एग्रीवोल्टाइक क्या है?
- एग्रीवोल्टाइक, जिसे एग्री-फोटोवोल्टाइक (Agri-Photovoltaics – APV) भी कहा जाता है, एक ऐसी भूमि उपयोग प्रणाली है, जिसमें एक ही भूमि पर एक साथ कृषि गतिविधियाँ और सौर ऊर्जा उत्पादन किया जाता है।
- इस प्रणाली के अंतर्गत सौर पैनलों को लगभग 10–12 फीट की ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है, जिससे उनके नीचे खेती की गतिविधियाँ निरंतर जारी रह सकें।
- इस प्रकार एक ही भूमि से खाद्यान्न तथा नवीकरणीय ऊर्जा दोनों का उत्पादन होता है, जिससे भूमि उपयोग दक्षता तथा किसानों की आय में वृद्धि होती है।
- सरकारी समर्थन: पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान) विकेन्द्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन तथा कृषि के सौरकरण को बढ़ावा देता है।
- एग्रीवोल्टाइक, खेती योग्य भूमि को कम किए बिना किसानों को बिजली उत्पादन की सुविधा देकर पीएम-कुसुम योजना का पूरक बन सकता है।
महत्त्व
- किसानों के लिए दोहरी आय: किसानों को फसल से होने वाली आय के साथ-साथ भूमि पट्टे (Lease) अथवा बिजली बिक्री से भी आय प्राप्त होती है, जिससे ग्रामीण आय की स्थिरता बढ़ती है।
- उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे की पायलट एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में छाया-सहिष्णु फसलों की उत्पादकता में लाभ देखा गया है।
- सूक्ष्म जलवायु (Microclimate) के लाभ: सौर पैनल आंशिक छाया प्रदान करते हैं, जिससे वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) तथा मिट्टी की नमी की हानि कम होती है। इससे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों को लाभ मिलता है तथा जलवायु अनुकूलन क्षमता बढ़ती है।
- रणनीतिक क्षेत्रों की ऊर्जा सुरक्षा: यह IndiaAI Mission के अंतर्गत भारत की एआई आत्मनिर्भरता की दिशा में सतत ऊर्जा आधारित संगणन (Compute) अवसंरचना उपलब्ध कराता है तथा जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत ग्रिड पर निर्भरता कम करता है।
- भूमि उपयोग दक्षता: अनुसंधानों से संकेत मिलता है कि एग्रीवोल्टाइक प्रणाली, केवल सौर ऊर्जा अथवा केवल कृषि की तुलना में अधिक संयुक्त भूमि समतुल्य अनुपात (Land Equivalent Ratio) प्रदान कर सकती है।
- जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप: यह भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) तथा 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक है।
चुनौतियाँ
- पारंपरिक भूमि-आधारित सौर परियोजनाओं की तुलना में ऊँचे ढाँचों (Elevated Mounting Structures) के कारण उच्च पूंजीगत लागत।
- फसल चयन की सीमाएँ, क्योंकि सभी फसलें आंशिक छाया में नहीं उग सकतीं। इससे हल्दी, अदरक एवं हरी सब्जियों जैसी छाया-सहिष्णु फसलों तक इसकी उपयोगिता सीमित हो सकती है।
- ग्रिड एकीकरण की समस्या, क्योंकि सौर ऊर्जा उत्पादन अनिश्चित होता है। AI कार्यभार को निरंतर ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए मजबूत भंडारण एवं संचरण अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
- भूमि स्वामित्व एवं किसानों की सहमति से जुड़े मुद्दे, क्योंकि बड़े कॉर्पोरेट परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण विस्थापन जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह
- एक राष्ट्रीय एग्रीवोल्टाइक रणनीति तैयार की जाए, जिसमें छाया-अनुकूल फसलों के चयन के मानदंड, वैकल्पिक भूमि पट्टा मॉडल तथा किसानों को लाभ में भागीदारी के विकल्प शामिल हों।
- ऐसी समावेशी योजना सुनिश्चित की जाए, जो किसानों के भूमि अधिकारों की रक्षा करते हुए भारत को AI-आधारित डिजिटल विकास तथा जलवायु-अनुकूल ऊर्जा संक्रमण—दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति में सक्षम बनाए।
स्रोत: IE
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